Monday, December 24, 2012

मीडिया का गला घोटना चाहती है सरकार ?

क्या कैमरों को तोड देने से आवाज दब जायेगी। कितने मूर्ख है हमारे देश के नेता जो ऐसा आदेश देते हुए एक बार भी नही सोचते कि सही मायने मे मीडिया का स्वर्ण युग अब शुरू हुआ है। क्योंकि अब हर व्यकित पत्रकार है। पत्रकारिता की ये परिभाषा नयी मीडिया ने दी है। रविवार को निहत्थे लोगों और मीडिया पर पुलिसिया हमले को लोकतंत्र पर हमला क्यूं ना माना जाए? आखिर ये हमला अपराध क्यू ना माना जाए।जब सब दिल्ली पुलिस के जवानों ने अपने बैच खोल रखें थें। एन डी टी वी के जांबाज पत्रकार उमा शंकर सिंह ने आर पी एफ के आला अधिकारी से मौके पर पूछा कि लाठी के बूते आप करना क्या चाहते है? तो अधिकारी को जबाब नही सूझा और वो भागते फिरे। महिलाओं बच्चों और निहत्थे लोगो पर लाठियां। और वो भी मीडिया को निसाना बनाने के साथ, तो कर्इ बडे सवाल खडे होते है? 
आखिर मीडिया को निशाना क्यूं बनाया गया?क्या ये लोकतंत्र के चौथे खम्भें को डिगाने की कोशिश तो नही?लाठी से देश की आजादी भी नही मिली थी। महात्मा गांधी ने भी अंहिसा के रास्ते पर ही आजादी पार्इ लेकिन देश की पुलिस व्यवस्था की तानाशाही और आवाज दबाने की कोशिशे अंग्रेजों से ज्यादा क्रूर लगती है।इस घटना से जुडी तमाम तस्वीरों को देखा। एक फोटो मे एक पुलिसवाला एक महिला को मार रहा है। दूसरे फोटो मे एक सत्तर साल की बुढिया जमीन पर गिरी है और बगल मे उन्नीस बीस साल की बच्ची खडी है और पास ही मे एक पुलिस वाला डंडे से बूढी औरत को मार रहा है। ऐसी बहुत सारी तस्वीर देखी। यकीन मानिऐ मन गुस्से और वेदना से भर गया कि हम ऐसे देश मे रहते है।जहां कोर्इ सुरक्षा नही और जिस देश को सत्याग्रह के बल पर आजादी मिली हो। वहां निहत्थों पर लाठी, मीडिया को डरा कर, कैमरें तोड कर आवाज दबाने का प्रयास उस पर जख्मों पर नमक गृहमंत्री का बयान कि रूस के राष्ट्रपति आ रहे है इसके चलते उनके सामने देश की गलत छवि ना जाए। इसलिए ये क्रूरता पूर्ण कृत्य किया गया। ठंडक में लोगो को पानी से लोगो को नहलाया। मीडिया के लोगों को पानी से नहलाया कैमरों पर पानी की बौछार की। यही बात एक बार गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे शालीनता से जनता से एक बयान मे कह देते कि वो जनता की भावना समझते है।और कडी से कडी कारवार्इ की जाऐगी और दोषियों को कडी से कडी सजा मिलेगी तो यकीन मानिये। जनता लौट जाती लेकिन इन्हे तो ये कहने मे लाज आती है,गृह मंत्री है।

बालात्कारियों के लिए कडी सजा की मांग के लिए निकले लोगों पर लाठियां चलाकर पुलिस ने लोगो को भगाया नही है। इस देश के नागरिक अधिकारों पर भी प्रश्न उठा दिया है। जहां के वो भी नागरिक है।क्या शांतिपूर्ण प्रर्दशन करना एक लोकतांत्रिक देश मे अपराध है? क्या मीडिया वहां रिपोटिंग के अलावा कुछ और कर रही थी?जानबूझ कर कुछ उपद्रवियों को हटाने के बहाने दिल्ली पुलिस के जवानों ने निहत्थे लोगों व मीडिया पर हमला बोला। ये उनका इस प्रर्दशन से निपटने का तरीका था।

दिल्ली क्या पूरा देश असुरक्षित है। और अपराध को बढाने का श्रेय पुलिस महकमा को जाता है क्योकि ये पूरी तरह से अपराधी है,क्योकि पुलिस का प्रशासन नेताओं के आगे नतमस्तक है।उन्ही के इसारे पर ये नाचते है। और ये अपराध ही है कि बिना बैच के पुलिस के जवान ऐसी बर्बरता पूर्ण कारवार्इ करे। क्या ये पुलिस की वर्दी का अपमान नही? कि बिना बैच के ऐसे कार्य सिर्फ इस भावना से किए गये कि आला नेता का आदेश था। किसके आदेश पर ये कारवार्इ की गयी।इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कौन अपने पद को छोड रहा है? इंडिया गेट को चारों तरफ से घेर कर स्कूली छात्र छात्राओं बुजुर्गो के साथ मीडिया पर लाठियां चलाने का अधिकार पुलिस को किसने दिया?क्यूं मीडिया कर्मियों पर लाठी चलार्इ? जाहिर सी बात है आवाज दबाने का प्रयास साफ दिखता है। क्या मीडिया का गला घोटना चाहती है सरकार? अगर हां तो लडार्इ आर पार की करें ना छुप छुप के लडने का क्या मजा? आये मैदान मे प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक लगा कर।यकीन मानिये एक बार और आपातकाल घोषित कर प्रेस के अधिकारों को छीन कर देख ले इस देश का हर आदमी सिर्फ सिर्फ पत्रकारिता करता नजर आयेगा उस दिन। क्योंकि आज वो अपनी बात एक नही बहुत सारे माध्यमों से लोगों तक पहुचा सकता है। और बातों को कम्यूनीकेट करना ही मीडिया का मूल काम है इससे अतिरिक्त कुछ नही। और आज ना वो अपने कुकृत्यों को दबा सकते है ना तो लोगों को आलोचना करने से। थू है देश की पुलिस पर व शर्म है दिल्ली सरकार व गृह मंत्री पर एक पत्रकार मित्र का स्टेटमेंट फेसबुक स्टेटस पढियें 

" पुलिस वालो ने आज इन्तहा कर दी है बड़े क्या बच्चे सब को मोटे मोटे लट्ठो से जम के मारा हैं सवेरे से ये आंसू गैस और पानी से वार करते रहे फिर अँधेरा होते ही सभी मीडियाके कैमरे तोड़ दिए या बंद करा दिए पूरे इंडिया गेट को चारो तरफ से घेर लिया ताकि हम भाग न सके और अचानक से हम पर टूट पड़े 

अफरातफरी मच गयी जवान लोग तो भाग खड़े हुए लेकिन 14.15 साल के बच्चे भी वहां थे उन पर इन दरिंदो ने मोटी मोटी लाठियों से सर और छाती पर मारा अगर कोई महिला याबूढा गिर गया तो भी उसपर लाठिया बरसाते रहे मेरे सामने एक पुलिसवाले ने एक महिलाकी छाती पर 4 बार डंडे से मारा महिला गिर गयी हम दोस्त सब उसे बचाने भागे और पुलिस को खीच के हटाया व महिला को उठाया भाई फिलहाल अस्पताल में हूँ एक दोस्त का सर फट गया हैं उसी का इलाज करवा रहा हूँ मेरे पैर में काफी चोट आई है पूरा बदन लाल है लाठियों के कारण "

साफ है कि आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है क्या ये बलात्कार नही है ? नागरिक अधिकारों का बलात्कार। लोकतंत्र के चौथे खम्भें का बलात्कार। अब ये लडार्इ सिर्फ बलात्कार के एक शर्मिदा करने वाले कुकृत्य तक ही सीमित नही रही है। पुलिसिया डंडे मीडिया के अधिकारों व नागरिक अधिकारों तक के हनन के दोषी है। ये लडार्इ अब सरकारी दमन तंत्र, राजनीतिक पार्टियों की चुप्पी को भी दिखा रही है। ये कोर्इ नया कार्य नही किया है पुलिस ने जो हमे चौंका दे।हमारे देश की पुलिस का यही क्रूर चेहरा है। जो लम्बे समय से तमाम इलाकों मे गांवों मे जंगलों मे अपने जमीनों या हक की लडार्इ लड रहे लोगों पर शहरों मे तमाम अत्याचार करते रहे है। अगर इस देश का प्रशाशन नागरिकों को नागरिक नही समझेगा । मीडिया को उसका कार्य करने से रोकने की कुचेष्ठा करेगा और उनके अधिकारों का हनन करेगा तो लोकतंत्र मे ये बात स्वीकार के योग्य नही है। अभी तो कुछ युवा जागेगे है अभी और जागेगे मीडिया व नागरिक अधिकारों के हनन का जबाब तो देना ही पडेगा सरकार को। 

पुण्य प्रसून के साख पर दाग लगाने के बाद हिन्दी पत्रकारिता की चुनौतियां


हिन्दी पत्रकारिता के नए हालात और चुनौतियां


साल 2012 का आखिरी महीना चल रहा है। पिछले साल की तरह ही ये साल भी कुछ खास नही रहा है, हिन्दी पत्रकारिता के लिए। हिन्दी पत्रकारिता मे जिस तरह सच और खरा बोलने वालों की संख्या तेजी से कम हुयी है। उसी तरह हिन्दी पत्रकारिता की धार कुंद होती चली गयी है व साख को घुन लग गया है। अभी प्रभूचावला व बरखा दत्त को हम भुला नही पा रहे थे कि जी न्यूज के समीर अहलूवालिया व सुधीर चौधरी की कारगुजारी पचाऐ नही पच रही। और उस पर पुण्य प्रसून का इन लोगो का पक्ष लेना, खुद पुण्य प्रसून के साख को दाग लगा गयी।
हिन्दी पत्रकारिता के ये नए हालात नयी चुनौतियों को पेश कर रहे है। जिसका क्या प्रभाव होगा ? ये तो आने वाला समय ही बताऐगा। लेकिन इस हालात से मार्कण्डेय काटजू जैसे लोग जरूर खुश हुए होगें। कुछ दिनों पहले इन्होनें कहा था कि प्रेस की आजादी को कुचल देना चाहिए  हालाकि इस बात के लिए बाद मे इन्होनें माफी भी मांग ली थी।लेकिन क्या इनकी ऐसी मंशा नही समझी जाए अगर ऐसी मंशा नही थी तो कहा क्यूं था?
हरिहरन की गायी एक गजल याद आ रही है  जब कभी बोलना वक्त पर बोलना मुददतो सोचना मुखतसर बोलना  सही भी है क्योंकि एक बार निकले हुए शब्द वापस नही आते।
खैर मुददे पर वापस लौटते है। क्या हिन्दी पत्रकारिता आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा पा रही है?
मीडिया की जिम्मेदारी समाज के प्रति है। जब तक उसकी समाज मे साख बरकार है उसके चौथे खम्भे का स्वरूप बना रहेगा। लेकिन लगातार विघटन कारी ताकतें मीडिया की साख को कमजोर करने के प्रयास मे लगी हुयी है। पिछले दिनों दो संपादक क्या गिरफ्तार हुए लगा पूरा का पूरा संपादक कुनबा ही दोषी हो गया। फिर भी पत्रकारिता आज भी राजनीति जैसे पेशे से साफ है। क्योंकि पत्रकारिता आज भी जन से जुडी है। आज तो नयी पत्रकारिता का दौर है,हर आदमी पत्रकार है। नयी मीडिया सभी के लिए है। मै फेसबुक आरकुट आदि की बात कर रहा हूं। कहां तक कमजोर करने की कोशिश करियेगा साहब?
लेकिन फिर ये साल भी गुजरते गुजरते हिन्दी पत्रकारिता पर कुछ दाग तो लगा ही गया।
पुण्य प्रसून जैसे मीडिया कर्मी जिनकों जाने कितने सफल मीडिया कर्मी अपना हीरों मानते थे। बाजार ने उनकी भी साख सैलरी के बदले खरीद लिया। ऐसा क्यूं हुआ ?
माखन लाल चतुर्वेदी ने कहा था  पत्र हमारा शस्त्र है शत्रु हमारा शस्त्र ही तोड डाले ऐसा अवसर मत आने दो। फिर भी यह सत्य है कि सत्य को प्रकाशित ना करें तो सत्य से विचलित होगें। तुम्हारा ये खेल मंहगा भी पड जाए तो मुझे पश्चाताप नही होगा
                                                         अब अगर माखन लाल चतुर्वेदी के शब्दों पर गौर करें और वर्तमान का विश्लेषण र्इमानदारी से करे तो आज तो मीडिया का सबसे बडा शत्रु तो मीडिया संस्थानों का मालिक है। और ये मीडिया संस्थान या तो नेताओं के है या फिर किसी पूंजी पति के फिर पत्रकारिता को दोषी क्यों बनाया जाता है? क्यों किसी पेड न्यूज के सामने आने पर पहले उस संस्थान के मालिक को नही पकडा जाता। क्यूं किसी को अपने साख पर दाग लगाने को मजबूर होना पडता है?यही नही आज समाज मे पत्रकारों पर हमले भी ज्यादा हो रहे है। क्यों पत्रकारों को सुरक्षा नही मिल पा रही है? तमाम प्रश्नों के बीच सबसे बडा प्रश्न पत्रकारिता की साख का है।खबरों की सत्यता व निश्छलता का है।
वर्तमान मे पत्रकारिता को ऐसे पत्रकारों से सीख लेनी चाहिए। और पत्रकारिता समाजिक सरोंकारों से जुडी हुयी होनी चाहिए। पत्रकारों को स्वार्थो मे पड कर अपने वास्तविक उददेश्यों को नही भूलना चाहिए और जो सही मायने मे सामाजिक उददेश्यों व हितों से जुडी हो ऐसी पत्रकारिता को पत्रकारिता से माना जा सकता है।


Saturday, November 24, 2012

फेसबुक पर कमेंट करना कोई गुनाह नहीं


अभिव्यक्ति की आजादी सभी को है। फेसबुक पर कमेंट करना कोर्इ गुनाह नहीं है। मुम्बर्इ पालघर में दो लडकियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत चुकानी पडी। महज फेसबुक पर कमेंट करना भारी पडा।

आजादी के बाद संविधान का निर्माण हुआ। जिससे देश के राजनैतिक, एंव सामाजिक परिदृश्य में परिवर्तन आया। समाचार पत्रों के उददेश्य में भी परिवर्तन आया, अब समाचार पत्र व न्यूज चैनल खबरों के साथ मनोरंजन सामग्री भी प्रकाशित करने लगे संविधान में मिली अभिव्यकित की स्वतंत्रता का पत्र मनमाने ढंग से इस्तेमाल करने लगे हैं। ऐसे न्यूज चैनलों व समाचारपत्रों के खिलाफ कोर्इ आवाज उठती नही सुनार्इ देती है।

लेकिन फेसबुक पर कमेंट की वजह से किसी को पुलिस पकडे तो सोचना पडेगा, क्या देश मे अभिव्यकित की स्वतंत्रता है?अगर फेसबुक समाज का मीडिया है तो पुलिसिया कारवार्इ की इसी मीडिया पर खूब आलोचना हुयी है।

आज भारत को स्वतंत्र हुए 63 साल हो गये है। इतने सालों मे समाचार पत्र इतने आधुनिक हो गए है। कि वो मसालेदार खबरों को बेचते है। एक तरफा खबरों को बेचते है । पेड न्यूज के मकडजाल मे उलझे मीडिया समूहो को कोर्इ कानून नही रोकता लेकिन सामाजिक स्वतंत्रता को बाधित करने के षडयन्त्र रोज ही रचे जाते है। सोशल मीडिया की ताकत को जानती है,सरकारें। यही कारण है कि राजनेताओं के अंडबड बयान सोशल मीडिया पर आते ही रहते है। क्या सोशल मीडिया पर लिखना मना है। महज ये लिखने पर कि बाल ठाकरे जैसे लोग रोज पैदा होते है और रोज मरते हैं पुलिस छात्राओं को गिरफ्तार कर लेती है। तो इसे वाक व अभिव्यकित की स्वतंत्रता मे बाधा ना माना जाए। और ये क्यों ना माना जाऐ कि ऐसे कार्य सत्ताधारियों के इशारे व दबाव मे पुलिस करती है?

गणेश शंकर विधार्थी ने भाषा की स्वतंत्रता को इस प्रकार व्यक्त किया था - मुझे देश की आजादी और भाषा की आजादी में से किसी एक को चुनना पड़े तो नि:संकोच भाषा की आजादी चुनूंगा। क्योंकि देश की आजादी के बाद भी भाषा की गुलामी रह सकती है। लेकिन भाषा आजाद हुर्इ तो देश गुलाम नहीं रह सकता। तो गणेश शंकर विधार्थी के इस कथन को माने तो हम आज भी गुलाम है। क्यों कि अगर वाक व अभिव्यकित के वजह से किसी को पूरे देश के सामने शर्मिदा होना पडे। पुलिसिया जांच का शिकार होना पडें,तो ये शर्म का विषय है।

मुम्बर्इ जैसे दिन रात जागने वाले शहर के बंद पर सवाल उठाने पर तो मुम्बर्इ पुलिस बडी मुस्तैद निकली। और इन लडकियों के चाचा के क्लीनिक मे घुस कर तोड फोड करने वालों को सोशल मीडिया पर विरोध के बाद गिरफ्तार किया। आखिर ऐसा क्यों किया ? क्या कोर्इ राजनीतिक दबाब था ? तमाम सवाल साफ है,और मुम्बर्इ पुलिस को जबाब देना पडेगा। कि भारत के आम जन को वाक व अभिकित की स्वतंत्रता है या नही ? और अगर है तो इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी कौन ले रहा है ?

मीडिया के हो हल्ला मचाने के बाद , फेस बुक पर थू थू होने के बाद पुलिस ने इस घटना पर जांच बैठा दी है। माना लड़कियां मुम्बर्इ जैसे शहर की रहने वाली है। लेकिन अपमान व पुलिसिया फटकार कोर्इ भूले नही भूल पाता है। फिर ऐसे मे उन लडकियों को गिरफ्तार करने का आदेश देने वाले अधिकारी व पुलिस वालों की बर्खास्तगी क्यों नही? डरी सहमी शहीन ने अपना फेसबुक एकांउट बंद कर दिया। और उसकी सहेली ने कहा कि वो अब कभी कमेंट नही करेगी। क्या अपनी बात को कहने की आजादी नहीं है क्या ?

ये तो पक्का है कि हमारे देश की पुलिस नेताओं के इशारों पर नाचती है। अगर ऐसा नहीं है तो बाल ठाकरे के खिलाफ तो लाखों ने लिखा है, लेकिन लिखने के मामले मे हमला मुसलमान पर ही क्यों ?

हिन्दी के जाने माने कवि नागार्जुन ने भी तो बहुत पहले 7 जून 1970 को ही ठाकरे के बारे मे एक पूरी कविता लिख दी थी '' बर्बरता की ढाल ठाकरे '' किसी प्रशासन ने उन्हे गिरफ्तार नही किया था।ठाकरे के मरने पर और इस कविता को बहुत सारे लोगो ने अपने फेसबुक पर शेयर भी किया। उन पर कार्रवाई क्यों नहीं केवल दो मुस्लिम लड़कियों पर ही कार्रवाई क्यों ? आखिर किसी की कोर्इ व्यक्तिगत वजह तो नही?

बाल ठाकरे के बारे मे हिन्दी के जाने माने नाम राजेन्द्र यादव ने भी अपने वाल पर खूब लिखा है और नागार्जुन की कविता भी शेयर की है। तो राजेन्द्र की गिरफ्तारी क्यूं नही ?

वास्तव मे अगर फेसबुक स्टेटस के वजह से शाहीन को गिरफ्तार किया गया है । तो सामना व दोपहर का सामना के संपादको को पिछले कर्इ सालों मे सैकडों बार गिरफ्तार किया जाना चाहिऐ। सामना के संपादकीय ऐसे भडकाउ बयानों को सर्मर्थित करते रहे है ,जो उन्ही धाराओं के अनुसार संगीन अपराध है जो शाहीन पर लगाऐ गये । संपादकीय लिखने वाले ठाकरे और उनके संपादक संजय निरुपम से लेकर प्रेम शुक्ला और संजय राऊत तक की पूरी जिंदगी जेल जाते . जाते और बेल लेते . लेते बीत जाती । इनके खिलाफ कभी पुलिस की चूं भी हमने नहीं सुनी। ठाकरेशाही के सामने पुलिस की क्या हैसियत और पुलिस के सामने शाहीन जैसी लड़कियों की क्या हैसियत । ये देश के लिए और ख़ासतौर से महाराष्ट्र के लिए शर्मनाक है। निर्बल मजदूर ,रिक्सा चालकों उत्तर भारतीयों को मारा पीटा । जिसने हमेशा राष्ट्रविरोधी बयान दिया। उसे तिरंगे में लपेटकर प्रदेश सरकार ने अपनी चाटुकारिता का परिचय दिया है। और मुम्बर्इ पुलिस ने शहीन को गिरफ्तार कर राजनैतिक चाटुकारिता का परिचय दिया है।शर्म है ऐसी पुलिस पर। 

Friday, November 16, 2012

अपनी संभावनाऐं जानता है मीडिया


आज की राजनीति उस गंदे नाले की तरह है जिसकी सफार्इ नही होती और पत्रकारिता उस नाले मे घूमने वाले सूअर की तरह है। तो आप बखूबी अंदाजा लगा सकते है कि अकेले पत्रकारिता कितनी सफार्इ कर सकती है वास्तव मे,आजादी से पहले और बाद दोनो ही समय मे इस हथियार का बडा कायदे से लोगो ने इस्तेमाल किया ।
आज कोर्इ भी आमोंखास सभी पत्रकारिता के बारे मे कुछ भी राय रखने लगे है।एक तरह से पत्रकारिता के लिए यह अच्छा है, लेकिन क्या ? उनके द्वारा दी गयी पत्रकारिता की परिभाषा पूरी तरह सही है।या नीम हकीम खतरे जान ,अधूरी जानकारी मे वो अपना ज्ञान बघार रहे है। खास कर नेताओं को मीडिया से बडी नाराजगी है। लेकिन फिर क्यों मीडिया के कामकाज मे बहुत दखलन दाजी रखते है । और इन गधों की सारी परिभाषा पत्रकारों के इर्द गिर्द शुरू होती है। संस्थान के ओनर के विषय मे इनकी परिभाषा कोर्इ बात नही करती क्यों ? क्योंकि आज तमाम चैनल , न्यूज पेपर मे इनका पैसा लगा है । मीडिया एक लाभ और फेम का धंधा है।और चुनाव के समय ये मीडियम इन नेताओं का ऐजेंडा सेट करने के काम आते है। इसलिए समाज मे पत्रकारों व पत्रकारिता को बदनाम करके आज पत्रकारिता को इन्टरटेंमेंट का साधन बना डाला है। तमाशें मे तब्दील हो गयी है आज की पत्रकारिता । क्यों पेड न्यूज का सारा ठीकरा पत्रकारों पर फोडा जाता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी शुक्रवार को कहा,गैर जिम्मेदार पत्रकारिता का जबाब सेंसरशिप नही है और मीडिया के आत्म नियमन की वकालत की । लेकिन यह नही सोचा कि नियमन की जरूरत है वास्तव मे , नेताओं के द्वारा मीडिया मे पैसे लगाने के नियमन की और मीडिया के द्वारा अपना ऐजेंडा सेट करने के नियमन की जरूरत है । प्रेस दिवस पर प्रधान मंत्री ने पत्रकारिता के हित की खूब बाते की , उन्होने कहा कि पत्रकारिता को बाह्य नियन्त्रण से मुक्त होना चाहिए। जी हां होना चाहिए लेकिन क्या पत्रकारिता बाह्य नियन्त्रण से मुक्त है? नही ना तो फिर किसका नियन्त्रण है ,आज की पत्रकारिता पर सोचिए जरा । मीडिया हाउसों के मालिकों का या फिर जिनके पास इन बडी बडी मीडिया कंपनियो के शेयर है। कौन है ये ?मीडिया हाउसों के ओनर  नेता जन या फिर  कारपोरेट का कोर्इ धन पशु । आज कारपोरेट मे आती है पत्रकारिता प्रधानमंत्री जी,और आज के समय मे पत्रकारिता के सरोकारों की बात भी करना बेर्इमानी है। मीडिया अपना काम कर रहा है। तमाम आर टी आर्इ ऐकिटवसट मार दिए गये तमाम अच्छे पत्रकारों को पुलिसिया डंडे खाने पडते है। ये ओनर तो उन्ही के मेहनत की मलार्इ खाते है। डंडा खाऐ पत्रकार मलार्इ खाऐ ये। और अन्त मे एक आध चोरों के कारण पूरी पत्रकारिता बदनाम। कौन है ये पत्रकारिता को चरित्र प्रमाण पत्र देने वाला पाक चरित्र आदमी जरा बताऐ तो नाम । कैसा है उसका चरित्र ? उत्तर नही मिलेगा , मै जानता हूं पत्रकारिता आज भी जनसरोकारों के साथ है । बस ये बनिये व नेता अपनी हद मे रहे पत्रकारों को ज्यादा सिखाने की जरूरत नही है। पत्रकारअपना काम पूरे सरोकारों के साथ कर रहे है।

Monday, December 19, 2011

अदम गोडंवी को समर्पित कविताए

अदम गोंडवी खामोश क्यूं है


दर्द को जुबां दे पाता तो बता देता
आज वो खामोश क्यूं है
मोतियां आखों की बिखरनें से
रोक पाता तो बता देता
आज वो खामोश क्यूं है

महलों में नही दिलो में रहता था
दिलों के जख्म दिखा पाता तो बता देता
आज वो खामोश क्यूं है

लोगो की जुबां पर चढ गयी है बातें उसकी
शब्दों में अब भी जुबां है उसकी
उसकी जुबां में कह पाता तो बता देता
कि वो खामोश क्यूं है

राख बन कर मिल गया
धरती आकाश जल हवा अगिन में
हिन्दी जमीं इस खाली जमीं को
भर पाता तो बता देता
अदम गोंडवी खामोश क्यूं है

एक सूरज था जो आखिर ढल गया

फिर अन्धेरों को सौप कर ये देश
एक सूरज था जो आखिर ढल गया
अंत तक कहता रहा
ना लेना एहसान किसी का
वो अदम था,आखिर चला गया

जो जाते जाते भी कुछ कह गया
बगावत की जमीं पर काव्य को खडा कर
आदमी के हकों की बात ऐसी कह गया
भूल ना सकेगीं हिन्दी की सरजमीं जिसे
वह अदम था,आखिर चला गया

गूंजते है अब भी उसके शब्द
हिन्दी भाषियों के जुबानों पर
एहसासों के हर किवाड पर
खालीपन कितना ज्यादा भर
एक सूरज था जो आखिर ढल गया
वह अदम था,आखिर चला गया

अब बची है
सिर्फ उसके काव्य की रोशनी
फिर अन्धेरों को सौप कर ये देश
एक सूरज था जो आखिर ढल गया

Friday, October 28, 2011

मीडिया के नियन्त्रण पर किसका हित



पिछले कुछ आंदोलनों को देखकर सरकार की मंशा व नजरिया साफ तौर पर मीडिया को नियन्त्रित करने की है,ताकि वो खबरें समाज तक ना पहुचें जो सरकार की कार्यगजारी को उजागर करती हो।आइये उन प्रश्नो के उत्तर तलासते है जो इस सरकारी मंशा से खडे होते है?और प्रेस कानून में किन बदलाव की जरूरत है?और किन बदलाव की ओर सरकार की मंशा है?
पहले तो क्या प्रेस कानूनों मे बदलाव की जरूरत है? तो जी हां आज के परिवेश को देखते हुए ,पत्रकारों की दशा और स्थित को देखते हुए।प्रेस कानूनों में बदलाव की जरूरत है।क्यों कि आज प्रेस कानूनों को प्रेस के सबसे छोटी ईकाई जिला संवाददाता के भी हित में होना जरूरी है।
अभी क्या हो गया कि भारतीय पत्रकारिता की गति अवरूद्घ करने का सियासी माहौल तैयार होने लगा है।तो आज के सियासत कारों को ये लगने लगा है कि उनकी कार्यगजारी को अगर जनता तक पहुचाने वाले तंत्र को ही कुछ अवरूद्व कर दें तो उनके कार्यकलापों को जनता तक पहुचाने वाली पत्रकारिता कमजोर हो जाएगी।और ये घोटालेबाज नेता आराम से इस देश का पैसा अनाप सनाप अपनी निजी मंशा से खर्च सकेगें या भ्रष्टाचार कर सकेगें।इनको अपने देश की आजादी का इतिहास शायद नही पता तभी तो कछ भी बोलते है,कछ भी करते है।पिछले कछ उदाहरण दूं तो मनीष तिवारी सरीखे नेता को मर्यादा हीन होकर बोलते हुए देखकर इन नेताओं को नही लगा कि नेताओं के अधिकार भी एक आम आदमी के अधिकार से ज्यादा नही है।लेकिन फिर ये क्यूं अपने पद के रसूख में अपनी मर्यादा भूल जाते है।आजादी के समय भी तमाम अधिनियम बना भारतीए पत्रकारिता को कमजोर करने के कार्य हुए थें।लेकिन पत्रकारिता तब भी नही डिगी थी अपने राह से ।आज भी पत्रकारिता अपने राह पर ही है।और कोई भी सेंसर पत्रकारिता को अवरूद्व ना कर सकेगी।
आज उन नामो पर जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आदोंलन से जडे थे,उन पर लगाम लगाने की कोशिशे रंग लाती नजर आ रही है।हो सकता है,ये मुहीम यही दम तोड दे लेकिन जंतर मंतर व राम लीला मैदान की भीड रूपये से खरीदी भीड नही थी।और इस देश की सियासत के निरालें रंग है,अभी कछ ही रंग दिखे है।गंगा जमनी तहजीब के रंग तो अभी चनाव में ही दिखेगें।
मीडिया के नियन्त्रण पर समाज या सरकार किसका हित है?अगर इस प्रश्न का उत्तर तलासेगें तो उत्तर यही मिलेगा कि जनता के हित में कोई फैसला सरकार को लेना हो या यूं कह दें आज के नेताओं को लेना हो, तो वो अपनी राजनैतिक लाभ यानि वोटो का गणित जरूर बैठाएंगे कुंल मिला कर मीडिया को नियन्त्रित करने की मंशा जन हित मे नही है। मीडिया के नियन्त्रण पर किसका हित है?पेड न्यूज में किसका हित है?और मीडिया का सहारे का सबसे ज्यादा फायदा कौन उठाता है?ये बताने कि जरूरत ही नही है।
पत्रकार के लिए भी नियम कायदे कानून उतने ही है जितने की आम आदमी के,पत्रकारों के लिए भी आचार संहिता है,और प्रेस आयोग भी।वे वैसे ही कार्य कर रहे है जैसे कि देश में अन्य कानून कार्य करते है। तो पहले देश के आम आदमी को न्याय मिलने लायक कानून मजबूत करें।पत्रकार भी अपने आप उन्ही कानूनों के अन्दर आ जाएगा क्योंकि पत्रकारों को उतनी ही स्वतंत्रता है जितनी कि आम आदमी को।
सूचना क्रान्ति ने ना सिर्फ खबरों के माध्यम बदले बल्कि खबरों के तरीके और तेवर भी बदल दिए।जाहिर सी बात है आज सूचना संप्रेषण का इतना महत्व है व संप्रेषण के इतने साधन है कितनों पर और कैसे नियन्त्रण लगेगें।जाहिर सी बात है,भारत के राजनेताओं को विकास की राजनीति के नाम पर वोट मांगने की जरूरत है।

Tuesday, October 18, 2011

भष्टाचार,फिजूलखर्ची या कि विकास


ये कैसा विकास
विकास की किस परिभाषा में करोडों का पार्क,स्मारक बनवाना विकास कहलाता है।दलित कल भी पिछडा था,आज भी पिछडा है,और जो कुछ कर रहा है अपनी मेहनत से ही कर रहा है।आधुनिकता की अंधी दौड में बहते ये नेता जन शब्द का अर्थ ही भूल गए है।तो फिर जन सेवा का क्या मतलब होता है,ये कैसे समझ सकते है। कोई भी नेता हो,किसी पार्टी का हो,आज किसी भी नेता के अधिकार क्षेत्र के किए गए कार्यो की समीक्षा की जाए तो भ्रष्टाचार और फिजूलखर्ची ही क्यों उजागर होते है?
इस साल जब देश ने भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में युवाओं का सर्मथन देखा,तो नेताओं को भी समझना चाहिए कि जिस तरह के हालात में देश के भीतर आम आदमी रह रहा है,और बढती मंहगाई उसके लिए रोजमर्रा की परेशानी का कारण बन रही है।वह एक बडा सवाल खडा करती है। आखिर क्यों देश की ये दशा होती जा रही है?कि आम जन को हर तरफ दिक्कतें ही नजर आती है?मंहगाई और भ्रष्ट तंत्र ने आम जन का जीना दूभर कर दिया है।
जन सेवा के नाम पर चुने नेताओं को ये छूट कहां कि जनता के पैसे को जैसे चाहे वैसे खर्च करे।अपनी मूर्तियां लगवा कर अपनी जीवन गाथा पत्थरों पर उकेर कर जनता के पैसे की बरबादी क्यों?दलित नेताओ महापुरूषों के नाम पर ये दिखावा क्या शोभा पाता है?

एक तरफ भारत का किसान,शिक्षक,छात्र,आम आदमी जिंदगी से परेशान हो कर आत्महत्या कर रहा है।देश भष्टाचार की आंधी में जल रहा हो।ऐसे में दलित महापुरूषों के नाम पर अपनी मुर्तियां लगवाना कहां तक उचित है?
एक तरफ देश का किसान कर्ज में डूबा है,दूसरी तरफ उसके मेहनत से पैदा अनाज को गोदामों मे किसान से औने पौने दाम में खरीद कर सडाया जा रहा है।बरसात मे उसके बदइंतजामी की खबरें पढने को मिलती है।
उच्च शिक्षा बदहाल है तो प्राइमरी शिक्षा का इस देश में कोई भविष्य नही।सरकारी विभागों में भष्टाचार रूपी दीमक लगा है।इस देश मे आज भी लोग भूखे सोते है,या एक टाइम ही खाना खाते है,और फिर भी सरकार के हुक्मरान गरीबी की औनी पौनी परिभाषा देने में नही चूकते।
आजादी के ६० वर्ष बाद भी देश के तमाम इलाकों में सडके नही पहुची,लाइट व अन्य साधनों की बात तो छोड ही दे।जहां सुविधाऐं पहुची भी है वो बदहाल है।देश के मुख्य मार्ग गडडों से भरे है।
क्या केन्द्र की सरकार क्या राज्यों की सरकारें सभी जनता के लिए उनके सुविधा के लिए नही सोचती।वो केवल वोट की राजनीति करते है।और हराने पर क्यूं हारे इसकी समीक्षा करना जानते है।लोक तंत्र में जनता मालिक होती है।और जनता के सुविधा के लिए कानून बनाये गये है।
किन्तु नेता ये समझते है कि वो चुन कर गए है तो कुछ भी कर सकते है कोई भी निर्माण करा सकते है।कोई भी योजना लागू कर सकते है।तो ऐसा नही है आज बढते संचार के साधनों ने ही आम जन को इतना जागरूक किया है। कि अब किसी भी नेता को अगर वो जन विरोधी कार्य करता है।तो उसके पूरे कार्यो को समझते है, अब ये उस जन की जिम्मेदारी होती है की वो ऐसे लोगो को सबक सिखा दे।और आने वाले समय मे नेता वोट के लिए नही विकास के लिए राजनीति करें।तो शायद आने वाले कुछ वर्षो के बाद भारत का सच मे विकास दिखें किसान और गरीब के साथ शहरों में रहने वाला आम आदमी भी सुख से रह सके।
http://www.mediamanch.com/Mediamanch/Site/HCatevar.php?Nid=2401
media manch 19-10-2011

Monday, May 9, 2011

सत्याग्रह को अपमानित करता प्रशासन




कुछ सामान्य हकों के लिए अनसन पर बैठे छात्रों के साथ अक्सर सुननें मे आता है,कि उनपर पुलिस ने लाठियां भांजी गयी।अभी जामिया मीलिया में भी ये वाकया दोहराया गया।कुठिंत कुलपति के इशारे पर जामिया नगर पुलिस ने निर्दोष छात्रों को पीटा।छात्राओं के साथ भी बत्तमीजी की गयी।कुछ दिनों पूर्व इन्ही के इशारे पत्रकारिता के छात्रा का सामान उसके हास्टल से बाहर फेक दिया गया था। इस लाठीचार्ज में छात्र छात्राओं पर ना सिर्फ पुलिस बल्कि जामिया प्रसाशन ने भी हाथ साफ किया। कितने दुख की बात है कि आज के इस समय में दिल्ली भष्ट्राचार के खिलाफ शुरू हो चुकी जंग की साक्षी बन रही है। वही देश के एक ऐसे नामी संस्थान में सत्याग्रह कर रहें छात्रों पर ऐसी कुंठा से भरा वाकया जानबूझ कर सोची समझी मांसिकता के साथ अंजाम दिया जाता है। इन्हे सत्याग्रह का अर्थ नही पता,अगर स्वंत्रत देश में सत्य के लिए आग्रह कर रहे अहिंसात्मक आंदोलन कर रहे निर्दोष छात्रों पर एक विश्वविद्यालय की कुंठा इस रूप में परिणित होती है,तो अगर आज महात्मा गांधी आज जिन्दा होते तो निश्चय ही वो निशस्त्र प्रतिकार की शिक्षा ना देते।ऐसे शिक्षको को पढानें का क्या हक है,जो पुलिस के साथ मिल कर अपने छात्रों के साथ मार पीट करतें है।ऐसे कुलपति को अपने पद पर बना रहनें का क्या हक है?देश को आजादी दिलाने वाले महात्मा गांधी के द्वारा देश को सत्याग्रह की शिक्षा मिली है।उसका प्रयोग कर रहें छात्रों पर लाठियां भांजना क्या गांधी व सत्याग्रह का अपमान नही? आजादी का अपमान नही?जाहिर सी बात है,अपमान है।सत्याग्रह के लिए महात्मागांधी ने लिखा है,कि सत्य के लिए प्रेमपूर्वक आग्रह।अब अगर इस प्रेम पूर्वक आग्रह का ये अंजाम है,तो ऐसे सत्याग्रह का क्या मतलब?किसी को कुछ अडंगा लगा कर परीक्षा में बैठने से रोक देने से परीक्षा की गरिमा,निष्पक्षता व मानक नही बढ जाते।बल्कि नकल विहीन,पक्षपात से दूर,व शिक्षको द्वारा सही मूल्यांकन किऐ जाने से कोई परीक्षा आदर्श होती है।
इसके अतिरिक्त गंगा को लेकर नैनीताल उच्च न्ययालय के भष्ट्राचार के खिलाफ 68 दिन से अनशन पर बैठे संत निगमानंद को पुलिस द्वारा उठवा लिया जाता है।और अस्पताल में जबरियां भर्ती करवा दिया जाता है। और अब वे कोमा में चले गऐ है।19 फरवरी को उनका अनशन शुरू हुआ,और 27 अप्रैल को पुलिस गिरफ्तारी।पुलिस ने जब उन्हे अस्पताल में भर्ती किया तो वो स्वस्थ थे।अब ऐसी कौन सी दवाईयां उनकों दी गयी जिससे कि वे कोमा में चले गए।सरकार व प्रशासन द्वारा इस प्रकार सत्याग्रह के खिलाफ जो साजिशे है वो सत्याग्रह को बेमानी सिद्व करती है।और आने वाले समय में जन सामान्य को ससस्त्र प्रतिकार पर सोचने पर मजबूर कर रही है।
उधर गत 3 मई को मजदूरों पर हुयी फायरिंग के विरोध मे 9 मई को हुए मजदूर सत्याग्रह को जिस तरह से पुलिस ने लाठीचार्ज कर कुचलने का प्रयास किया।वो किसी तानाशाही से कम नही प्रतीत होता।जब जनता से उसके प्रतिरोध का शांतिपूर्ण किया जाने वाला अधिकार छीन लिया जाता है।तो जनता के पास एक ही चारा रह जाता है,ससस्त्र प्रतिकार।पहले से घोषित सत्याग्रह को कुचलने का ये शर्मनाक वाकया वास्तव में नेताओं व प्रशासन के दोगलेपन को बयां कर रहा है।एक तरफ तो इन नेताओं ने देश को आजादी के बाद से ही लूट लूट कर विदेशो में देश की पूंजी को सडा रहें है।उसको वापस लाने की पहल कवायद एक भी नेता व्यापारी करता नजर नही आ रहा।दूसरी तरफ अपने छोटी छोटी मांगों के बदले जनता को ये सिला मिल रहा है।जाहिर सी बात है,लगता है भारतीए संस्कृति,सभ्यता,मानवता सभी मूल्य नेताओं द्वारा व प्रशासन द्वारा नेताओं की चाटुकारिता के कारण बेमाने हो गए है।इतना बदनाम किया इन लोगो ने गाँधी को और उनके सत्याग्रह को कि शर्म आती है अब तो महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता कहते भी, आज का समय भी किसी गुलामी से कम नहीं..अदम गोण्डवी साहब की एक कविता ध्यान आ रही है इन नेताओं पर..............

जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे

ये बन्दे-मातरम का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे

सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे
वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे







Wednesday, April 27, 2011

इस हवा में फैली है बदलाव की बयार




किसी आंदोलन की शुरूवात यूं ही नही होती।किसी आंदोलन को होने के लिए समय व परिस्थियां होती है।कोई आदोंलन समय व परिस्थितयों के अनुरूप ही इतिहास बनता है।और इसी के साथ किसी आदोंलनों में शामिल भीड का अंदाजा केवल आंदोलनकारियों के साथ खडे लोगो को देखकर नही लगाया जा सकता।क्योंकि समय व परिस्थितयों के अनुरूप सिस्टम से लडाई के हथियार बदल जाते है।अगर इस माह के शुरूवात से अब तक के सभी घटनाक्रम पर नजर डाले तो स्थित बदलाव के बयार की हवा की सुगन्ध देती दिखाई देगी।मै केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की बात करू तो ये आंदोलन तो अभी पढें लिखें लोगो तक है।षहरों तक है,लेकिन इस आग की लपटे जब गांवों तक पहुचेंगी तब?क्या गांवों के लोगो में कम रोष है सिस्टम को लेकर? नही साहब,अभी ये आदोंलन अभी नया रंग लेगा। जब इसमें गावों का भी जन शामिल होगा। इस आंदोलन का दूसरा चरण तो शुरू हो चुका है। जब अभी से नेताओं की बौखलाहट दिखाई देने लगी है।तब क्या होगा जब इस आंदोलन में गांव के ग्रामीण उतरगें?सच्चाई यही है कि भारत की जनता अब और भ्रष्टाचार सहने को तैयार नही है।क्योंकि इससे सबसे ज्यादा प्रभावित आम आदमी ही होता है।गांधीवादी विचारक समाजसेवी अन्ना जी की आंखो से भारतीए पढें लिखे समाज ने जो सपना देखा उसे पूरा करने के लिए उस सपने को भारत के हर गांव व हर शहर तक पहुचानें के लिए अन्ना ने अपने आंदोलन के दूसरें चरण की शुरूवात कर दी है। बाबा रामदेव ने भ्रस्टाचार मिटाने के लिए अलग तैयारी कर रखी है।
कुल मिलाकर लडाई की शुरूवाती स्थिति ने ही इस बात का फैसला कर दिया था कि लोग इस अभियान के साथ है,और ये अभियान अभी थमा नही है।अन्ना के अनसन तोडते ही तमाम लोगों ने अनशन पर जो अंटशंट शुरू किया।उसने भ्रष्टाचार के खिलाफ की हवा को और तेज किया। कल्माडी को पड रहें जूतों से भ्रष्ट नेताओं और भष्ट नौकरशाहों को सोचना चाहिए,कि उनका नंबर भी आएगा।बात अब जनता की अदालत में है।और आज के समय में जब किसी इतने बडे अहिंसात्मक आंदोलन की कल्पना नही कि जा सकती,अन्नाहजारें ने ना सिर्फ आंदोंलन को सफल बनाया बल्कि जनलोक पाल बिल को कानून बनानें के लिए अब भी अपने आंदोलन पर कायम है।और अब तो उनके साथ युवावर्ग पूरी तरह से उतर आया है।और देश के सभी विश्वविद्यालयों में अन्ना जी की आंदोलन की हवा बह रही है।और इस दौडती भागते समय में जो जिस माध्यम से फोन,इन्टरनेट,टीवी शुभकामनाओं, आदि जैसे भी उसको लग रहा है,वो अन्ना जी के इस मुहिम से जुड रहा है।चंद स्वार्थी लोगो के विरोध भी नजर आ रहें है।लेकिन उनकी आवाज कही नही सुनाई दे रही क्योंकि समय अन्ना के पक्ष में है।कुछ लोग इस मुहिम के विरोधी इसलिए है,क्योंकि नेताओं से ज्यादा भ्रष्ट तो हमारे नौकरशाह और मीडिया है।और उनका डर विरोध के रूप में प्रकट हो रहा है।लेकिन अब आम आदमी जनसरोकारों की बात कर रहा है।अपने अधिकार की बात कर रहा है,तो आप अंदाजा लगा ले आंदोलन कितना कुछ सफल है।

Tuesday, April 19, 2011

बाजार के हाथों बिक गयी मीडिया







पूरी दुनिया के समाचार चैनलों व समाचार पत्रों के लिए पिछले दो दशक सबसे ज्यादा चुनौती पूर्ण रहें है।खास कर भारतीय मीडिया ने इन दो दशकों में खासे उतार चढाव देखें है।सूचना प्रौद्योगिकी में हो रहें बदलाव भारतीय मीडिया को चुनौतियां देते चले आ रहें है।बदलाव कि इस बयार में कई छोटे बडे मीडिया नजर आऐ और कई ने अपनी दुकानें समेटी या फिर अपनी दुकानों से बेच रहें सामान कहने का मतलब है,प्रसारित कर रहें कार्यक्रम या छप रही विषयवस्तु,लेआउट आदि में अमूलचूक परिवर्तन किए।मै किसी खास मीडिया संस्थान का नाम नही लेना चाहता लेकिन बह रही परिवर्तन की बयार में सभी मीडिया संस्थानों ने वो सब कुछ किया,जो उन्हे मुनाफा कमवा सकता था।लेकिन इन सब बातों में कही ना कही सभी ने अपने दर्शकों या पाठकों के साथ धोखा किया।खबरों के साथ ईमानदारी नही बरती,तरह तरह के भ्रामक व घटिया प्रयोग खबरों को लेकर किया।तरह तरह के नए और घटिया प्रोगामों का ईजाद सिर्फ सिर्फ टी आर पी के मकसद से किया गया। अब इस मकसद को पूरा करने के लिए समाचार चैनलों ने अपने नैतिकता से समझौता कर लिया।और अब टी बी यानि बुदधू बक्सा भी नए कलेवरों में रंग गया।बेवकूफ बने आम आदमी का काम रिर्मोट पर केवल हाथ चलाना रह गया।इन लोगो ने ना सिर्फ अपने पाठक,दर्शकों को ही धोखा दिया,बल्कि इन संस्थानों ने अपने परिवार या यू कह ले,अपने कर्मचारियों के साथ भी विश्वासघात किया।धोखा देने के क्रम में कुछ नामी गिरामी मीडिया घरानें भी कम ना निकले उन्होनें पत्रकारिता को बेचने के लिए शिक्षण संस्थान खोल लिया।चमक दमक को दिखा पत्रकारिता की मंहगी गुणवत्ता विहीन शिक्षा को बढावा दिया।बल्कि युवाओं को प्लेसमेंट के नाम पर खासी रकम फीस के रूप में वसूल कर उन्हें चंद रूपए की नौकरी के आगे बेच डाला।और इसके साथ साथ समाज को भी धोखा दिया।उसी का नतीजा निकल कर सामने आया,आज चाहे वो प्रिंट मीडिया हों या फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया। सभी ने अपनी विश्वसनीयता को खो दिया है।और बुद्विजीवी वर्ग ये सब देख कर खासा संशय की स्थित में रहा।और कुछ ईमानदार मीडिया बुद्विजीवी जिनसे परिवर्तन की बयार में अपना जमीर ना बेचा गया,उन्होनें अपना धंधा पानी बदल डाला। इन्टनेट और मोबाइल की नयी मशीनी विद्या ने तो भारत की मीडिया की दुनिया ही बदल डाली। कुछ मोबाइल टेपो ने ही बडे बडे दिग्गजों के गर्व को चूर चूर कर दिया।लेकिन काजल की कोठरी में पाक दामन कौन है।जो पकडे गये वो चोर जो बच गए वो दूसरों में कमियां निकालेगें ही।परिवर्तन की बयार ने मीडिया हाउसों को ये तो सिखा ही दिया था कि अगर इस होड में बने रहना है। तो बदल गए पत्रकारिता के बाजार के मुताबिक बिकने वाली खबरें लानी होगी।देर सबेर सभी ने समझा और बदल गए पत्रकारिता के बाजार में सभी उतर पडे।बिना किसी रोक टोक के गुणवत्ता विहीन कार्यक्रम,हसानें के नाम पर फूहडता,क्राइम के नाम पर अश्लीलता, आदि आदि। और ये सभी कुछ किया गया पैसों के लिए। और जब पैसों के लिए इन अखबारों व चैनलों ने अपनी पहचान बेच डाली, तो इन पर क्या भरोसा किया जा सकता है कि ये समाज को कुछ दे सकते है।और अब भारत में अपने पैरों पर खडी हो रही नव मीडिया से ही कुछ उम्मीद बची है। कि वो कुछ सार्थक करें जो देश को रहने लायक बनाए रखें।मै मीडिया चैनलों या अखबारों के खिलाफ नही हूं,बल्कि कहना ये चाहता हूं।इन्होनें अपने व्यवसायी मंसूबों की पूर्ति के लिए ही अपने आधार खबरों के साथ ही नाइंसाफी की।नव मीडिया अर्थात इन्टरनेट से जुडी मीडिया बेब आज ज्यादा लोकप्रिए हो रही है। उसका सीधा कारण है कि सूचनाऐं देने के सबसे तेज माध्यम है।और प्रिंट और इलेक्ट्रानिक माध्यमों की भी निर्भरता प्रत्यक्ष रूप में बेब माध्यमों पर दिखाई पडती है।और इस परिवर्तित समय में जो ही सबसे जल्दी खबरें दे सकेगा। वो ही अपने उज्जवल भविष्य को देखेगा।अभी तो अखबार टीवी व बेव तीनों में सूचनाऐं देने की होड है, कि कही वो सूचनाऐं देने मे पिछड ना जाऐ। इसी कारण कई बार बडी बडी गल्तियां हो रही है। खैर नव मीडिया भी अभी अपने घुटनों पर चल रही है। देखते है मीडिया आने वाले समय में किस करवट बैठेगी।

Sunday, April 17, 2011

आखिर नेता किस बात से बौखला गए? WRITTEN BY रवि शंकर मौर्य

SUNDAY, 17 APRIL 2011 19:13

अन्ना पर राजनेता

ये सारे नेता आखिर किस बात से घबरा गए है,अन्ना हजारे से या अन्ना हजारे को मिले व्यापक जन समर्थन से?

आज के दौर मे जब तकनीकी विकास ने हर चीज को बदल के रख दिया है।हर आमजन आत्म केन्द्रित है।ऐसे में किसी को ये उम्मीद न थी,कि आन्दोंलन अपनी शुरुआत से ही जन समर्थन की ये रफ्तार हासिल करेगा।

सभी पार्टियों का निशाना अब अन्ना हजारे पर है क्यों? सभी पार्टियों को ये आकलन करना चाहिए कि इतना व्यापक जनसमर्थन,युवाओं का जोरदार समर्थन ये एक नई तरह की क्रान्ति की शुरूआत है। ये नेता बनाई गई कमेटी के बारें मे कभी,तो कभी कुछ बातों को लेकर,आंदोलन के लिए पैसा कहां से आया जैसी फिजूल बातों को लेकर नैतिकता और देश भक्ति की बात कर रहें है।अमर सिंह को ये बात खराब लग गयी कि जनता ने चौटाला और उमाभारती को जंतरमंतर से भगा दिया,उनको ये आश्चर्य है कि अन्ना जी ने कैसे सारे नेताओं को भ्रष्ट कह दिया। और वो नैतिकता की दुहाई देते है,मान्यवर आप भूल गए जब संसद में नोटो की गड्डियां उछाली गयी थी,तब आप की नैतिकता कहां चली गयी थी।जब कुछ सांसद पैसा लेकर प्रश्न पूछने के आरोप मे पकडे गए थे,तब आप कहां थे।कोई भी राजनैतिक पार्टी अपने को चाहे जितना दूध का धुला साबित करे लेकिन सच्चाई ये है कि सभी के पास अपने पालतू गुंडे है या कि गुडों की ही पार्टी है।

धनबल भुजबल की बढती हुयी महत्ता ने चुनावों में आग मे घी का काम किया है। जितने भी एंटी काग्रेंस लीडर है वो सब जे पी आंदोंलन की उपज है।सबके सब छात्र राजनीति व संगठित छात्र एकता की ताकत को समझते है।कितने आश्चर्य की बात है,लिंगदोह सिफारिस लगाकर विष्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से छात्र राजनीति को एकदम खत्म कर दिया गया।छात्र आन्दोलन की उपज इतने सारे मान्यवर कहां है आप लोग?जिस पेड की डाल पर चढे उसी को काट दिया।अब नही गूंजती छात्र एकता जिन्दाबाद की आवाजें?

पूरे हिन्दी बेल्ट को तकनीकी शिक्षा हब के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।ये इंजीनियरिंग कालेज या तो नेताओं के है,या अपराधियों के या उद्योगपतियों के है। आप लोगो को कत्तई उम्मीद ना थी,जिन युवाओं को हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए तकनीकी मजदूर के रूप में तैयार कर रहें है।वही युवा ऐसे आन्दोलन को धार भी देगा।आप सब घबरा इस बात से गए हैं, कि जिस युवा को इस व्यवस्था ने एकदम किनारे रखा। आज का वही युवा व्यवस्था परिवर्तन की भूमिका तैयार कर रहा है।

जबानी लफ्फाजी करें सारे नेता,सारी पार्टियां।एक बात का मै चैलेंज करता हूं, सारी पाटियों का इतना संगठित नेटवर्क है,धनबल,भुजबल सब है, कर पाए तो करें खडा कोई इतना बडा आंदोलन जिसे लोगो का इतना व्यापक जनसमर्थन मिले,नही कर सकते।लोगो का इतना व्यापक जनसमर्थन भ्रष्ट नेताओं के बूते नही खडा होगा।

आप सभी मान्यवर घबरा गए है। जनता की व्यापक भागीदारी देखकर , युवाओं के जोष को देखकर, आपकी उम्मीद को झटका लगा है।आप समझ नही पा रहे है कि जनता जाग कैसे गयी?सो आप सभी मान्यवर कुछ भी कहें सूरज की ओर मुह करके थूकने पर अंजाम क्या होगा आप सभी को पता है ना? इसके केन्द्र में अन्ना है,लेकिन ये आन्दोलन पूरी तरह से आज के दौर के युवाओं का है। और इसका रंग अभी आने वाला समय बताएगा। अदम गोण्डवी साहब की एक कविता याद आ रही है कि इस व्यवस्था के बारे मे.....

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में

उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत

इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह

जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें

संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में

जनता के पास एक ही चारा है बगावत

यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में


रवि शंकर मौर्य पत्रकारिता से जुडें है, ये 2006 में हिन्दी से परास्नातक व 2009 में पत्रकारिता से परास्नातक की पढाई पूरी कर पत्रकारिता के पेशे से जुडे।इन्होने दूरर्दशन व जी न्यूज से ट्रेनिंग के बाद खोज इंडिया न्यूज में बतौर प्रोडूसर काम किया।इसके बाद इन्होने राजस्थान के कोटा शहर में दैनिक नवज्योति व दैनिक भास्कर के लिए रिर्पोटर के तौर पर काम किया है। लेखक का समाज व मीडिया के तमाम विषयों पर लेखन रहा है। लेखक से ravism.mj@gmail.com मेल आई डी के जरिऐं सम्पर्क किया जा सकता है।

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