Friday, May 6, 2011
Wednesday, April 27, 2011
इस हवा में फैली है बदलाव की बयार


Tuesday, April 19, 2011
बाजार के हाथों बिक गयी मीडिया



Sunday, April 17, 2011
आखिर नेता किस बात से बौखला गए? WRITTEN BY रवि शंकर मौर्य
SUNDAY, 17 APRIL 2011 19:13
अन्ना पर राजनेता
आज के दौर मे जब तकनीकी विकास ने हर चीज को बदल के रख दिया है।हर आमजन आत्म केन्द्रित है।ऐसे में किसी को ये उम्मीद न थी,कि आन्दोंलन अपनी शुरुआत से ही जन समर्थन की ये रफ्तार हासिल करेगा।
सभी पार्टियों का निशाना अब अन्ना हजारे पर है क्यों? सभी पार्टियों को ये आकलन करना चाहिए कि इतना व्यापक जनसमर्थन,युवाओं का जोरदार समर्थन ये एक नई तरह की क्रान्ति की शुरूआत है। ये नेता बनाई गई कमेटी के बारें मे कभी,तो कभी कुछ बातों को लेकर,आंदोलन के लिए पैसा कहां से आया जैसी फिजूल बातों को लेकर नैतिकता और देश भक्ति की बात कर रहें है।अमर सिंह को ये बात खराब लग गयी कि जनता ने चौटाला और उमाभारती को जंतरमंतर से भगा दिया,उनको ये आश्चर्य है कि अन्ना जी ने कैसे सारे नेताओं को भ्रष्ट कह दिया। और वो नैतिकता की दुहाई देते है,मान्यवर आप भूल गए जब संसद में नोटो की गड्डियां उछाली गयी थी,तब आप की नैतिकता कहां चली गयी थी।जब कुछ सांसद पैसा लेकर प्रश्न पूछने के आरोप मे पकडे गए थे,तब आप कहां थे।कोई भी राजनैतिक पार्टी अपने को चाहे जितना दूध का धुला साबित करे लेकिन सच्चाई ये है कि सभी के पास अपने पालतू गुंडे है या कि गुडों की ही पार्टी है।
धनबल भुजबल की बढती हुयी महत्ता ने चुनावों में आग मे घी का काम किया है। जितने भी एंटी काग्रेंस लीडर है वो सब जे पी आंदोंलन की उपज है।सबके सब छात्र राजनीति व संगठित छात्र एकता की ताकत को समझते है।कितने आश्चर्य की बात है,लिंगदोह सिफारिस लगाकर विष्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से छात्र राजनीति को एकदम खत्म कर दिया गया।छात्र आन्दोलन की उपज इतने सारे मान्यवर कहां है आप लोग?जिस पेड की डाल पर चढे उसी को काट दिया।अब नही गूंजती छात्र एकता जिन्दाबाद की आवाजें?
पूरे हिन्दी बेल्ट को तकनीकी शिक्षा हब के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।ये इंजीनियरिंग कालेज या तो नेताओं के है,या अपराधियों के या उद्योगपतियों के है। आप लोगो को कत्तई उम्मीद ना थी,जिन युवाओं को हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए तकनीकी मजदूर के रूप में तैयार कर रहें है।वही युवा ऐसे आन्दोलन को धार भी देगा।आप सब घबरा इस बात से गए हैं, कि जिस युवा को इस व्यवस्था ने एकदम किनारे रखा। आज का वही युवा व्यवस्था परिवर्तन की भूमिका तैयार कर रहा है।
जबानी लफ्फाजी करें सारे नेता,सारी पार्टियां।एक बात का मै चैलेंज करता हूं, सारी पाटियों का इतना संगठित नेटवर्क है,धनबल,भुजबल सब है, कर पाए तो करें खडा कोई इतना बडा आंदोलन जिसे लोगो का इतना व्यापक जनसमर्थन मिले,नही कर सकते।लोगो का इतना व्यापक जनसमर्थन भ्रष्ट नेताओं के बूते नही खडा होगा।
आप सभी मान्यवर घबरा गए है। जनता की व्यापक भागीदारी देखकर , युवाओं के जोष को देखकर, आपकी उम्मीद को झटका लगा है।आप समझ नही पा रहे है कि जनता जाग कैसे गयी?सो आप सभी मान्यवर कुछ भी कहें सूरज की ओर मुह करके थूकने पर अंजाम क्या होगा आप सभी को पता है ना? इसके केन्द्र में अन्ना है,लेकिन ये आन्दोलन पूरी तरह से आज के दौर के युवाओं का है। और इसका रंग अभी आने वाला समय बताएगा। अदम गोण्डवी साहब की एक कविता याद आ रही है कि इस व्यवस्था के बारे मे.....
काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में
रवि शंकर मौर्य पत्रकारिता से जुडें है, ये 2006 में हिन्दी से परास्नातक व 2009 में पत्रकारिता से परास्नातक की पढाई पूरी कर पत्रकारिता के पेशे से जुडे।इन्होने दूरर्दशन व जी न्यूज से ट्रेनिंग के बाद खोज इंडिया न्यूज में बतौर प्रोडूसर काम किया।इसके बाद इन्होने राजस्थान के कोटा शहर में दैनिक नवज्योति व दैनिक भास्कर के लिए रिर्पोटर के तौर पर काम किया है। लेखक का समाज व मीडिया के तमाम विषयों पर लेखन रहा है। लेखक से ravism.mj@gmail.com मेल आई डी के जरिऐं सम्पर्क किया जा सकता है।
आमजन के सपने और भ्रष्ट्राचार के खिलाफ मुहिम - रवि शंकर मौर्य( Date : 15-04-2011)
(रवि शंकर मौर्य /कोटा )
रवि शंकर मौर्य पत्रकारिता से जुडें है, ये 2006 में हिन्दी से परास्नातक व 2009 में पत्रकारिता से परास्नातक की पढाई पूरी कर पत्रकारिता के पेशे से जुडे।इन्होने दूरर्दशन व जी न्यूज से ट्रेनिंग के बाद खोज इंडिया न्यूज में बतौर प्रोडूसर काम किया।इसके बाद इन्होने राजस्थान के कोटा शहर में दैनिक नवज्योति व दैनिक भास्कर के लिए रिर्पोटर के तौर पर काम किया है। लेखक का समाज व मीडिया के तमाम विषयों पर लेखन रहा है। लेखक से ravism.mj@gmail.com मेल आई डी के जरिऐं सम्पर्क किया जा सकता है।
Wednesday, March 9, 2011
पत्रकारिता शिक्षा और युवा ......... रवि शंकर मौर्य
(रवि शंकर मौर्य )
हमारे देश मे तकरीबन 20 से ज्यादा भाषाऐं बोली जाती है।कई संस्कृतियां यहां पनपी पोषित और पल्लिवत हुयी।कई बोलियों ने भाषाओं का रूप लिया।और कई विषयों ने नए स्वरूप पाए।पिछले कुछ वर्षो में पत्रकारिता के विषय ने जो नया स्वरूप पाया है।उसने समाचार पत्र व समाचार चैनलों के मालिकों को व्यवसाय का एक नया रास्ता दिखाया है।कुछ मीडिया मठाधीषों को भी ये रास्ता भाया।और तमाम ने पत्रकारिता के व्यवसाय को अपना पत्रकारिता के नाम और अपनी साख को बेचना शरू किया।छोटे बडे मीडिया हाउस व तमाम लोगो ने अपनी पत्रकारिता की दुकानें खोली।और पत्रकारिता की मशीनी विद्या सिखाने का नया धंधा शुरू कर दिया।इस लेख को लिखते लिखते कुल दीप नैयर साहब की एक लाइन याद आ रही है कि ष्ष्जब लोकतंत्र में हर कोई लोकमत को अपनी ओर मोडने का प्रयत्न करे तो ऐसे समय में एक विशेष प्रकार की पत्रकारिता जन्म लेती हैश्श्।आप खुद महसूस करके देखे कितना सटीक व सही लिखा है।जो अक्षरशः आज के परिवेष में सच की तरह दिख रहा है। पत्रकारिता का उदभव 131 ई पूर्व रोम में हुआ था।और आज पूरे विश्व में पत्रकारिता युवाओं के एक पंसदीदा विषय में एक है,और अपने देश में भी।तमाम युवा अपने जीवन को पत्रकारिता के इस ग्लैमर से रंगना सजाना व अपने नाम को बडा होता देखने के लिए इस क्षेत्र में कदम रखते है। लेकिन युवाओं के इस विषय के प्रति के आर्कषण ने पत्रकारिता में एक अजब सा माहौल ला दिया है।उनके इस दिलचस्पी का खासा मुनाफा पत्रकारिता के बाजार ने कमाया है और कमा रहें है।क्योंकि आज की पत्रकारिता कोई सरोकारी पत्रकारिता नही।आज के समाचारपत्रों व समाचार चैनलों को खबर चाहिऐ कम से कम पैसे में। पहले उन्होंने अध्यापकों आदि दूसरें कार्य कर रहें लोगो को साथ लेकर अपने इस उददेश्य को पूरा किया।आज फुल टाइम कम पैसे में काम करने वाले मिल रहे है। और 100 प्रतिशत प्लेशमेंट के नाम पर पैसे लेकर पत्रकारिता को सीखाने की व्यवस्था बनी हुयी दिखाई दे रही है। विश्वविद्यालयों को छोड दे,तो पत्रकारिता के जो छोटे बडें संस्थान हैउनमें ज्यादातर मंहगी फीस लेकर जो सार्टिफिकेट दे रहें है वो कही से एप्रूबड नही होते पूरे के पूरे फर्जी सार्टिफिकेट होते है। अब रही पत्रकारिता के शिक्षा की बात तो इतनी मंहगी और गुणवत्ता विहीन पत्रकारिता की शिक्षा का हाल है। कमोबेस विश्वविद्यालयों में भी पत्रकारिता के स्टूडेंट अपनी शिक्षा से संतुष्ट नही है। इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस की सख्त आवश्यकता बनती जा रही है।इन प्राइवेट कालेजों की मंहगी शिक्षा का विरोध भी हूआ है।लेकिन पत्रकारिता की ताकत व साख ने बदस्तूर इस शिक्षा व्यवस्था को जारी रखा हुआ है।ये तथाकथित चैनल व अखबार अपने मंच के आबाज के जरिए और अपने यहां नौकरी के लालच को दिखा इस मंहगी पत्रकारिता की शिक्षा को बदस्तूर जारी रखें हुऐ है।शिक्षा के गुणवत्ता और उसके प्रमाण पत्र के गुणवत्ता के आधार पर ही किसी संस्थान की फीस होनी चाहिएं।ना किसी लालच के बदले फीस वसूलने की व्यवस्था।शिक्षा के इन्ही व्यवसायीकरण के परिणामतः आज की शिक्षा व्यवस्था मानक स्तरों के पास तो नही पहुचती।बल्कि ग्लैमर और अन्य ना जाने किन मानकों के करीब होती जा रही है। इस व्यवस्था को चलाने वाले खासे धनी व नामी गिरामी संस्थान व लोग है।इसलिए पत्रकारिता के इस नऐ व्यवसाय पर कोइ अंकुश नही लग पा रहा है।कौन किस संस्थान की पोल खोले।क्यों कि चोर चोर मैसेरे भाई पत्रकारिता संस्थान तो कमोबेस सभी छोटे बडे चैनल अखबार व इससे जुडे लोग चला रहें है।और नही चला रहें तो आगे चल कर चलाऐंगें।इसलिए पत्रकारिता बेचने का धंधा बदस्तूर जारी है।समाज में ये पैसा उगाही का एक ऐसा रास्ता है,जो गलत होते हुऐ भी पूरे सम्मान के साथ जारी है।इस व्यवस्था पर लगाम लगनी जरूरी है।
( लेखक पत्रकारिता से जुडें है ये 2006 में हिन्दी से परास्नातक व 2009 में पत्रकारिता से परास्नातक की पढाई पूरी कर पत्रकारिता के पेशे से जुडे।इन्होने दूरर्दशन व जी न्यूज से ट्रेनिंग के बाद खोज इंडिया न्यूज में बतौर प्रोडूसर काम किया।इसके बाद इन्होने राजस्थान के कोटा शहर में दैनिक नवज्योति व दैनिक भास्कर के लिए रिर्पोटर के तौर पर काम किया है। लेखक का मीडिया के तमाम विषयों पर लेखन रहा है। लेखक से ravism.mj@gmail.com मेल आई डी के जरिऐं सम्पर्क किया जा सकता है।)
http://www.mediamanch.com/Mediamanch/Site/HCatevar.php?Nid=1134
